सेकुलरिज्म और लॉ एंड ऑर्डर पर भाषण चलता रहा, यूनुस के दौर में फिर हुई हिन्दू की लिंचिंग

बांग्लादेश में 6 दिनों में दो हिन्दुओं की लिंचिंग से सनसनी मच गई है. मुल्क के भावी प्रधानमंत्री बताए रहे BNP नेता तारिक रहमान अपने मुल्क के लिए लोकतांत्रिक और सेकुलर बांग्लादेश का सपना देख रहे थे. लेकिन मौजूदा मोहम्मद यूनुस की सरकार हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचार को कहीं से नहीं रोक पा रही है.

Dec 26, 2025 - 10:36
सेकुलरिज्म और लॉ एंड ऑर्डर पर भाषण चलता रहा, यूनुस के दौर में फिर हुई हिन्दू की लिंचिंग

24 दिसंबर की सुबह जब बीएनपी नेता तारिक रहमान बरसों बाद अपने वतन लौटने की तैयारी कर रहे थे, उनके दिल में एक नई उम्मीद पल रही थी—एक ऐसा बांग्लादेश, जहां लोकतंत्र की रौशनी हर घर तक पहुंचे, जहां कानून का शासन सचमुच जिंदा हो। मगर उसी वक्त उनके सपनों के बिल्कुल विपरीत तस्वीर जमीन पर दिखाई दे रही थी। देश में कानून व्यवस्था को लेकर जिस बदलाव का सपना वे देख रहे थे, उसकी धज्जियां खुलेआम उड़ाई जा रही थीं।

इसी रात राजबाड़ी ज़िले के पांग्शा उपजिला में भयावह हिंसा हुई। रात करीब 11 बजे एक उग्र भीड़ ने हिंदू युवक अमृत मंडल को घेर लिया, उसे बेरहमी से पीटा और मौत के मुंह में धकेल दिया। पुलिस उसे गंभीर हालत में अस्पताल ले गई, मगर रात 2 बजे डॉक्टरों ने अमृत को मृत घोषित कर दिया। इस दिल दहलाने वाली वारदात ने पूरे इलाके को सदमे में डाल दिया।

अमृत मंडल की मौत की खबर 25 दिसंबर की सुबह आग की तरह फैली। और उसी दिन—ठीक उसी दिन—तारिक रहमान 17 साल बाद लंदन से ढाका की धरती पर लौटे। उनका स्वागत उम्मीदों और नारेबाजी से हुआ, लेकिन देश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा इस उम्मीद पर काले बादल बनकर मंडरा रही थी।

6 दिन में दो हिंदुओं की हत्या—पहले दीपू, अब अमृत…!

18 दिसंबर को दीपू चंद्र दास की हत्या और फिर 24 दिसंबर को अमृत की लिंचिंग—इन दोनों घटनाओं ने बांग्लादेश के हिंदुओं को डरा दिया है। समुदाय के लोग गुस्से और डर दोनों में हैं, जबकि पुलिस और अंतरिम सरकार पर आरोप है कि वे सच्चाई को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।

पुलिस का दावा है कि यह सांप्रदायिक हमला नहीं था, बल्कि आपराधिक गतिविधियों से जुड़ा मामला था। उनका कहना है कि अमृत पर कई गंभीर केस दर्ज थे। लेकिन सवाल वही है—क्या किसी भी भीड़ को किसी इंसान की जान लेने का अधिकार दिया जा सकता है? कानून का राज अगर यही है, तो फिर आम लोग किसपर भरोसा करें?

ढाका में अपनी पहली जनसभा में तारिक रहमान ने साफ कहा कि देश में कानून-व्यवस्था हर हाल में कायम रहनी चाहिए। उन्होंने चीफ एडवाइजर मोहम्मद यूनुस को भी यही संदेश दिया कि शांति और अनुशासन की कीमत पर कोई समझौता नहीं हो सकता।

अपने भाषण में उन्होंने चेताया, “देश की शांति किसी भी कीमत पर बनाए रखनी होगी। हर साजिश का सामना धैर्य और एकता से करना होगा।” उनके शब्दों में लोकतंत्र की पुकार थी, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है।

“यह देश केवल मुसलमानों का नहीं… हिंदुओं, बौद्धों, ईसाइयों और हर नागरिक का है”

तारिक रहमान ने कहा कि बांग्लादेश के लोग अपना लोकतांत्रिक अधिकार वापस चाहते हैं। वे एक ऐसा देश चाहते हैं जहां हर नागरिक बिना डर के जी सके। उन्होंने लाखों लोगों की भीड़ से कहा, “यह देश सभी का है—पहाड़ों के लोगों का, मैदानों के लोगों का, मुसलमानों, हिंदुओं, बौद्धों और ईसाइयों का। हम ऐसा बांग्लादेश बनाएंगे, जहां हर व्यक्ति सुरक्षित घर लौट सके।”

लेकिन यूनुस सरकार के दौर में बढ़ती घटनाएं कुछ और ही कहानी कह रही हैं। खासकर अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हो रहे हमले बढ़ते जा रहे हैं, जिससे समुदाय में गहरा डर बैठ गया है।

चटगांव में पांच दिनों में चार हिंदू घरों में आग—अल्पसंख्यकों में दहशत

चटगांव के राउज़ान इलाके में हालात और भी भयावह हैं। यहां पांच दिनों में अल्पसंख्यक समुदाय के चार घरों को आधी रात के समय आग के हवाले कर दिया गया। हमलावर पहले मुख्य दरवाजों को बाहर से बंद कर देते, फिर घरों में आग लगा देते। कई परिवार तो अपनी जान बचाने के लिए बांस और टिन की दीवारें तोड़कर भागे।

ताजा हमला मंगलवार सुबह 3:45 बजे हुआ, जब शिल्पाड़ा इलाके में सुलाल शिल और अनिल शिल के घरों को निशाना बनाया गया। पुलिस को मौके पर एक हाथ से लिखा बैनर मिला जिसमें 43 मोबाइल नंबर दर्ज थे—जो इस हमले को और भी संदिग्ध बना देता है।

दोनों परिवारों के लोग घर में सो रहे थे जब धुआं और आग की लपटों ने उन्हें जगाया। दुबई से शादी के लिए घर लौटे मिथुन शिल ने कहा, “हमने बाहर निकलने की कोशिश की लेकिन दरवाजे बंद थे… बाहर आग की लपटें थीं, हम डर के मारे टूट चुके थे।”