ममता की ‘ग्रीन फाइल’ से खुला पावर गेम! ED के साथ खुली जंग, बंगाल उबल पड़ा

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले 'ग्रीन फाइल' प्रकरण ने सियासी पारा बढ़ा दिया है। आई-पैक I-PAC दफ्तर पर ईडी की छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का स्वयं वहां पहुंचना और एक लैपटॉप व रहस्यमयी फाइल लेकर निकलना चर्चा का विषय बना हुआ है।  यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है, जिससे 2026 के चुनावों से पहले राज्य में राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। क्‍या है पूरा मामला?

Jan 13, 2026 - 17:02
ममता की ‘ग्रीन फाइल’ से खुला पावर गेम! ED के साथ खुली जंग, बंगाल उबल पड़ा

बंगाल की राजनीति में इन दिनों एक रहस्यमयी ‘ग्रीन फाइल’ ने ऐसा तूफान खड़ा कर दिया है कि हर तरफ इसी की चर्चा है। आई-पैक के दफ्तर पर ईडी की कार्रवाई के बीच अचानक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का पहुंच जाना और उसी दौरान एक लैपटॉप के साथ यह हरी फाइल लेकर बाहर निकलना पूरे राज्य को चौंका गया। राजनीतिक हलकों में सवाल गूंज रहा है—इस फाइल में आखिर ऐसा क्या है जिसने चुनाव से ठीक पहले सियासत की धड़कनें तेज कर दीं?

कोलकाता की गलियों से लेकर दिल्ली की दहलीज तक ‘दीदी बनाम ईडी’ का टकराव अभी अपने चरम पर है। विधानसभा चुनाव बस कुछ महीनों दूर हैं और ऐसे समय में आई-पैक पर छापेमारी ने पूरे चुनावी समीकरण को हिला कर रख दिया है। बंगाल का इतिहास गवाह है कि हर चुनाव से पहले कोई बड़ा धमाका निश्चित तौर पर होता है—और इस बार यह ‘ग्रीन फाइल’ वही विस्फोटक ट्रिगर बनकर उभरी है।

2016 का नारद स्टिंग, 2021 से पहले की कोयला-मवेशी तस्करी और अब यह आई-पैक प्रकरण—हर बार बंगाल की राजनीति एक नए विवाद से हिलती रही है। लेकिन इस बार की घटना सबसे अलग और अभूतपूर्व है, क्योंकि भारतीय राजनीति में शायद पहली बार किसी मुख्यमंत्री ने ईडी की मौजूदगी के दौरान मौके पर जाकर सीधा हस्तक्षेप किया है। यह कदम राज्य और केंद्र के बीच टकराव को नए स्तर पर ले गया है।

ईडी जहां आई-पैक के ऑफिस और सह-संस्थापक प्रतीक जैन के घर दस्तावेज खंगाल रही थी, वहीं ममता का वहां पहुंचना किसी हाई-वोल्टेज सस्पेंस फिल्म जैसा नजारा बन गया। उनकी कार से निकलते ही माहौल गर्मा गया और मिनटों में सोशल मीडिया पर ‘ग्रीन फाइल’ वायरल हो गई। छह घंटे चले इस रोमांचक ड्रामे ने जांच एजेंसी को सवालों के घेरे में डाल दिया और ममता ने इसे अपनी पार्टी की गोपनीय रणनीति पर हमला बताया।

मुख्यमंत्री का आरोप है कि भाजपा ईडी का इस्तेमाल कर तृणमूल की 2026 की चुनावी प्लानिंग हासिल करना चाहती है। कोलकाता में ममता का पैदल मार्च और दिल्ली में तृणमूल सांसदों का विरोध प्रदर्शन इसी राजनीतिक लड़ाई का हिस्सा था। उनके समर्थक इसे दीदी की जुझारू छवि की नई मिसाल बता रहे हैं, जबकि विपक्ष का दावा है कि यह सब चुनावी सहानुभूति पाने का तरीका है।

भाजपा ने उल्टा वार करते हुए आरोप लगाया कि ममता ने एक निजी कंसल्टेंसी फर्म को बचाने के लिए कानून को बंधक बना लिया। संबित पात्रा ने तो यहां तक कहा कि मुख्यमंत्री ने बंगाल को भारत के कानूनों से बाहर कर दिया है। भ्रष्टाचार और अराजकता को इस बार भाजपा अपना सबसे बड़ा चुनावी हथियार बनाने की तैयारी में है, और यह मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है।

ईडी का दावा है कि कोयला तस्करी की काली कमाई से 20 करोड़ रुपये हवाला के जरिए आई-पैक तक पहुंचे, जिन्हें गोवा चुनाव में खर्च किया गया। दूसरी ओर बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल की है और कोलकाता व विधाननगर पुलिस ने ईडी पर ही ‘डेटा चोरी’ का मामला दर्ज कर लिया है। अब टकराव सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि एक संवैधानिक संघर्ष बन चुका है।

केंद्रीय एजेंसी बनाम राज्य की पुलिस—यह ऐसा संघर्ष है जिसकी मिसाल शायद ही कहीं मिले। बड़ा सवाल यह है कि इस राजनीतिक विस्फोट का फायदा आखिर किसे मिलेगा? भाजपा, तृणमूल की सरकार पर भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा और प्रशासनिक असफलताओं को लेकर हमलावर है, वहीं माकपा भी उसी सुर में भाजपा का साथ देती दिख रही है।

माकपा नेता मोहम्मद सलीम ने सवाल उठाया कि आखिर एक निजी कंपनी के लिए मुख्यमंत्री को सड़कों पर क्यों उतरना पड़ा। यह ममता की छवि पर सीधा हमला है, लेकिन ‘बंगाल की बेटी’ कहलाने वाली ममता हर बार हमलों को अपने पक्ष में मोड़ने में माहिर मानी जाती हैं। उनकी रणनीति साफ है—हर विवाद को बंगाली अस्मिता बनाम बाहरी ताकतों की लड़ाई में बदल देना।

और फिलहाल, पूरा बंगाल इसी ‘ग्रीन फाइल’ और ‘डेटा चोरी’ की गूंज में डूबा हुआ है। आने वाले दिनों में यह विवाद किस करवट बैठेगा, यह तय करेगा कि 2026 के चुनावी रण में असली लाभ किसके खाते में जाएगा—दीदी के या उनके विरोधियों के।