पाकिस्तान ने फिर लीक किया परमाणु सीक्रेट? आखिर सऊदी अरब ने कैसे बनाया बम
2025 के रक्षा समझौते के बाद पाकिस्तान द्वारा सऊदी अरब को परमाणु मदद देने की अफवाहें तेज हुईं। अब्दुल कादिर खान और उत्तर कोरिया मामले की यादें फिर ताजा हो गईं। हालांकि कोई सबूत नहीं मिले और सऊदी के पास परमाणु हथियार नहीं हैं, वह केवल सिविल न्यूक्लियर कार्यक्रम पर फोकस कर रहा है।
सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिनों से एक सनसनीखेज दावा आग की तरह फैल रहा है—"पाकिस्तान ने फिर से अपने परमाणु राज बेच दिए, और सऊदी अरब अब परमाणु बम रखने वाला नया देश बन गया!" पुरानी यादों को हवा देते हुए लोग अब्दुल कादिर खान वाले विवाद को दोबारा उठा रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि जैसे पाकिस्तान ने उत्तर कोरिया को मदद देकर बम दिलाया था, वैसे ही अब उसने सऊदी अरब को भी ताकतवर बना दिया है. लेकिन इन वायरल दावों के पीछे असली सच्चाई क्या है?
क्या सच में सऊदी अरब के पास परमाणु बम है?
साफ और सीधी बात—नहीं. आज तक किसी भी अंतरराष्ट्रीय एजेंसी, चाहे वह IAEA हो या अमेरिकी खुफिया विभाग—किसी ने भी यह पुष्टि नहीं की है कि सऊदी अरब ने परमाणु हथियार बना लिए हैं. खुद सऊदी अरब बार-बार कह चुका है कि उसका उद्देश्य बिजली उत्पादन के लिए परमाणु तकनीक विकसित करना है, हथियार बनाना नहीं. यह बात इसलिए और पक्की हो जाती है क्योंकि सऊदी अरब परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का सदस्य है, जो परमाणु हथियार बनाने पर सख्त रोक लगाती है.
पिछले दो सालों में सऊदी अरब और अमेरिका के बीच सिविल न्यूक्लियर कोऑपरेशन का बड़ा समझौता हुआ है—नवंबर 2025 का ऐतिहासिक करार. इसके तहत सऊदी अरब यूरेनियम को सीमित स्तर पर एनरिच कर पाएगा, लेकिन सिर्फ ऊर्जा उत्पादन के लिए, हथियारों के लिए बिल्कुल नहीं. हां, इतना जरूर है कि यदि ईरान कभी परमाणु बम बना लेता है, तो सऊदी भी पीछे नहीं रहेगा—यह क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान खुद कह चुके हैं. मगर अभी तक जमीन पर ऐसा कुछ नहीं हुआ है.
अब्दुल कादिर खान का पुराना और विवादास्पद अध्याय
यह सच है कि पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान दुनिया के सबसे बड़े न्यूक्लियर स्कैंडल से जुड़े नाम रहे हैं. 2004 में खुलासा हुआ कि उन्होंने गुप्त नेटवर्क बनाकर उत्तर कोरिया, ईरान और लीबिया को परमाणु तकनीक बेची थी. इसके बाद उन्हें नजरबंद कर दिया गया. उसी तकनीकी मदद की बदौलत उत्तर कोरिया ने अपना परमाणु कार्यक्रम आगे बढ़ाया. लेकिन सऊदी अरब को लेकर जो अफवाहें फैली थीं—कि उसने पाकिस्तान को पैसे दिए और बदले में बम 'बुक' किया—उनका कोई ठोस सबूत आज तक नहीं मिला. BBC की 2013 की रिपोर्ट भी सिर्फ दावे पर टिकी थी, प्रूफ पर नहीं.
क्या पाकिस्तान ने फिर से परमाणु सीक्रेट लीक कर दिए?
2025 में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुआ स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट चर्चा में आ गया. वजह थी कुछ अधिकारियों के बयान—जिनमें कहा गया कि ‘सभी सैन्य साधन’ उपलब्ध कराए जाएंगे. पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के बयान ने आग में घी डाल दिया, जब उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर पाकिस्तान की परमाणु क्षमता भी ‘डिटरेंस’ के लिए सऊदी के साथ शेयर की जा सकती है. बस इतना कहना था, और इंटरनेट पर अफवाहों का तूफान उठ गया.
असलियत क्या है?
यह समझौता असल में पारंपरिक सैन्य सहयोग, संयुक्त अभ्यास और हथियारों की सप्लाई तक ही सीमित है. सऊदी अरब चीन से नई बैलिस्टिक मिसाइलें जरूर खरीद रहा है, लेकिन वे गैर-परमाणु हैं. ना पाकिस्तान ने कोई सीक्रेट ट्रांसफर किया और ना ही सऊदी के पास कोई छिपा हुआ न्यूक्लियर कार्यक्रम चल रहा है.
तो फिर सऊदी अरब क्यों चर्चा में है?
क्योंकि अफवाहें तेज हैं, लेकिन सच्चाई कमजोर. पुराने विवादों और राजनीतिक बयानों के कारण लोग मान लेते हैं कि पर्दे के पीछे कोई बड़ा खेल चल रहा है. पर हकीकत यह है—न तो पाकिस्तान ने नया परमाणु राज लीक किया है, और न ही सऊदी अरब ने कोई परमाणु बम तैयार किया है. 2025 का डिफेंस एग्रीमेंट सिर्फ रणनीतिक साझेदारी है, न्यूक्लियर ट्रांसफर नहीं. आज की तारीख में यह पूरी कहानी बस सोशल मीडिया की गूंज है—जिसमें शोर ज्यादा है, सबूत बहुत कम.