भारत से ट्रेड डील या अमेरिका की जीत? अमेरिकी मीडिया का दावा—समझौता पूरी तरह वॉशिंगटन के पक्ष में!
मोदी सरकार ने भले 50 प्रतिशत से 18 प्रतिशत टैरिफ़ होने का स्वागत किया है लेकिन कई ऐसी बातें हैं, जिन्हें अमेरिका के हक़ में बताया जा रहा है और भारत के लिए इसे पूरा करना आसान नहीं होगा.
भारत–अमेरिका ट्रेड डील पर सोमवार को डोनाल्ड ट्रंप की घोषणा ने राजनीति से लेकर आर्थिक गलियारों तक हलचल मचा दी है. अब बड़ा सवाल यह है कि ये समझौता वास्तव में किसके लिए फायदेमंद साबित होगा.
ट्रंप प्रशासन ने पहले भारत पर 50% जैसा भारी-भरकम टैरिफ़ लगाया था, जिसे अब घटाकर 18% कर दिया गया है. यह कटौती सुनने में बड़ी राहत जैसी लगती है, लेकिन विशेषज्ञों की राय कुछ और ही कहानी बयां कर रही है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस फैसले का स्वागत किया है, मगर जानकारों का कहना है कि 18% भी काफी ऊंचा है—खासतौर पर तब, जब ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से पहले भारत पर अमेरिकी टैरिफ़ बेहद कम हुआ करते थे.
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कम्युनिकेशन एडवाइजर रहे पंकज पचौरी ने एक्स पर लिखा कि 2004 तक औसत अमेरिकी टैरिफ़ 3.31% था, और मनमोहन सिंह–बुश परमाणु समझौते के बाद यह गिरकर 2.93% तक पहुंच गया था. अब इसी तुलना में 18% का जश्न मनाया जाना कई लोगों के लिए चौंकाने वाली बात है.
इधर व्हाइट हाउस इस डील को अपनी बड़ी जीत बताकर पेश कर रहा है. प्रेस सेक्रेटरी कैरोलाइन लेविट के मुताबिक यह समझौता अमेरिकी कामगारों, कंपनियों और उपभोक्ताओं के लिए बेहद फायदेमंद साबित होने जा रहा है.
ट्रंप ने अपने मंच ट्रुथ सोशल पर दावा किया था कि 18% टैरिफ़ के बदले भारत रूस से तेल आयात बंद कर देगा, अमेरिकी सामान पर ज़ीरो टैरिफ़ लागू करेगा और अमेरिका से 500 अरब डॉलर के उत्पाद खरीदेगा. वहीं विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह दावे सच निकले तो मोदी सरकार के लिए यह डील बेहद चुनौतीपूर्ण होगी.
एबरडीन इन्वेस्टमेंट्स के जेम्स थॉम के अनुसार, इस डील से अमेरिकी बाज़ार में भारत के टेक्सटाइल, लेदर, ज्वेलरी, खिलौने और फर्नीचर जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को बड़ी राहत मिलेगी. 18% टैरिफ़ पाकिस्तान, वियतनाम और बांग्लादेश जैसे प्रतिद्वंद्वियों से कम है, जिससे भारतीय उद्योग को बढ़त मिल सकती है.
अमेरिकी अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स ने हालांकि इस समझौते पर कई सवाल उठाए हैं. उसका कहना है कि ट्रंप ने भले इसकी तत्काल प्रभाव से लागू होने की बात कही हो, लेकिन डील की कई अहम शर्तें अब भी साफ़ नहीं हैं.
रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि ट्रंप द्वारा दावा किए गए 500 अरब डॉलर की खरीद पर भारत की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है. ऐसे में समझौते की असल तस्वीर अभी भी धुंधली बनी हुई है.
अमेरिकी इंटरनेशनल डेवलपमेंट फ़ाइनैंस कॉर्पोरेशन की पूर्व अधिकारी निशा बिस्वाल का कहना है कि यह कदम अमेरिका–भारत संबंधों को एक नए स्तर पर ले जा सकता है और आगे गहराई से सहयोग की संभावनाएं खोलता है.
दूसरी ओर रूस में इस खबर को लेकर बेचैनी देखी जा रही है. क्रेमलिन ने कहा है कि भारत ने तेल आयात बंद करने के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं दी है, लेकिन वे हालात पर नज़र बनाए हुए हैं.
रूस के उपप्रधानमंत्री अलेक्ज़ेंडर नोवाक ने दावा किया है कि वैश्विक बाज़ार में रूसी तेल की मांग खत्म नहीं होने वाली है, इसलिए भारत का फैसला उनके राजस्व पर बड़ा असर नहीं डालेगा.
न्यूयॉर्क टाइम्स का कहना है कि ट्रंप के सभी दावों को पूरा करना भारत के लिए आसान नहीं होगा. उदाहरण के लिए अमेरिकी डेयरी भारत के विशाल उपभोक्ता वर्ग के लिए स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि वहां की गायें पूरी तरह शाकाहारी नहीं होतीं.
अगर ऐसा हुआ तो भारत के 7 करोड़ डेयरी निर्भर परिवारों पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है. यही कारण है कि अमेरिकी कृषि उत्पादों का भारत में प्रवेश अब भी सीमित रहने की संभावना है.
ब्लूमबर्ग ने भी अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी कि यह डील भारत की चुनौतियां खत्म नहीं करती. मोदी सरकार के लिए कृषि क्षेत्र से जुड़ी रियायतें हमेशा से मुश्किल रही हैं और भारत का एग्रीकल्चर सेक्टर भारी सुरक्षा कवच में ढका हुआ है.