सोना-चांदी क्यों धड़ाम गिरे? अचानक आई भारी गिरावट के पीछे का खेल क्या है, और आगे निवेशकों के लिए क्या है राह?
कई महीनों से सोने और चांदी में आई भारी तेज़ी बीते शुक्रवार को थम गई और दोनों ही धातुओं में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई. इस गिरावट को लेकर एक्सपर्ट क्या कह रहे हैं?
सोने और चांदी की लगातार भागती-दौड़ती कीमतों का तूफ़ान आखिरकार शुक्रवार को अचानक थम गया, वह भी ऐसी गिरावट के साथ जिसने बाज़ार को हिला कर रख दिया. हफ्तों से बढ़ते दामों की रफ्तार मानो एक झटके में अटक गई.
30 जनवरी को सोना एक ही दिन में करीब 12 प्रतिशत लुढ़क गया, जबकि चांदी ने 26 प्रतिशत की रिकॉर्ड गिरावट दिखाई. प्लैटिनम भी पीछे नहीं रहा और इसमें 18 प्रतिशत की बड़ी गिरावट दर्ज हुई. इससे पहले इन धातुओं की कीमतें इतिहास के नए शिखर छू चुकी थीं.
पैनम्योर लिबेरम के विशेषज्ञ टॉम प्राइस ने फ़ाइनैंशियल टाइम्स से बातचीत में कहा कि यह बाज़ार के चरम पर पहुंचने का क्लासिक संकेत है. उनके अनुसार अभी निवेशकों में भारी भ्रम और डर का माहौल है और सभी किसी ठोस दिशा की तलाश में हैं.
एमकेएस पैम्प की विश्लेषक निकी शील्स ने इसे क़ीमती धातुओं के इतिहास का सबसे अस्थिर महीना बताया. उन्होंने कहा कि गुरुवार और शुक्रवार को आई यह उथल-पुथल एक ऐसे दौर के अंत में आई जब हर दिन नए रिकॉर्ड बन रहे थे.
वेनेज़ुएला, ग्रीनलैंड और ईरान जैसे देशों में उभरते संकट और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अनिश्चित नीतियों ने निवेशकों को सुरक्षित पनाहगाह यानी गोल्ड-सिल्वर की ओर भागने पर मजबूर कर दिया. इस भागदौड़ ने कीमतों को अप्राकृतिक ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया.
शील्स के मुताबिक, दुनिया में रोजाना हो रही “अकल्पनीय घटनाओं” ने तेज़ रैली को और भड़का दिया, जो आखिरकार अपनी ही रफ्तार से ठहर गई. यह बढ़त उनके अनुसार बहुत तेज़ और अस्थायी थी.
पिक्टेट एसेट मैनेजमेंट के सीनियर रणनीतिकार अरुण साई ने कहा कि जब कीमतों में इतनी जोरदार तेजी दिखती है, तो अस्थिरता बढ़ना स्वाभाविक है. फिर भी उनका मानना है कि केंद्रीय बैंकों और बड़े निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी से सोने को लंबी अवधि में फायदा मिलता रहेगा.
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट बताती है कि यह गिरावट 1980 के दशक के बाद की सबसे बड़ी इंट्राडे क्रैश थी. चांदी ने भी ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की, जिसका असर पूरे मेटल मार्केट पर फैल गया.
विशेषज्ञों का कहना है कि कीमतों में लगातार चढ़ाई के बाद यह गिरावट सिर्फ समय की बात थी. कुछ ताज़ी खबरों ने बस इसे ट्रिगर कर दिया. ट्रंप की व्यापार नीतियों से पहले ही बाज़ार तनाव में था.
पिछले एक साल में सोने के दाम 60 प्रतिशत बढ़ चुके थे. क़ीमती धातुओं में बेतहाशा डिमांड ने महीने दर महीने नए रिकॉर्ड बनाए और कहीं-न-कहीं यही तेज़ी भविष्य की बड़ी गिरावट का बीज बो रही थी.
जनवरी में यह क्रेज़ और बढ़ गया जब करेंसी की कमजोरी, फेडरल रिज़र्व से जुड़ी अनिश्चितता, ट्रेड वॉर और भू-राजनीतिक हलचल ने निवेशकों को फिर से गोल्ड-सिल्वर की ओर मोड़ दिया.
ब्लूमबर्ग के मुताबिक, फेड चेयरमैन के लिए केविन वार्श के नाम की चर्चा इस बड़ी गिरावट की एक वजह बनी, हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि करेक्शन पहले ही बेहद जरूरी हो चुका था.
ट्रंप द्वारा केविन वार्श के नाम की घोषणा ने न सिर्फ बाजार का ध्यान खींचा बल्कि कई नेताओं ने भी उनकी तारीफ की. कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने उन्हें कठिन समय के लिए उत्कृष्ट विकल्प बताया.
रणनीतिकार क्रिस्टोफर वोंग का कहना है कि बाजार ऐसे ही किसी बहाने का इंतज़ार कर रहा था ताकि रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी कीमतों में ठंडक आ सके.
कई निवेशकों ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए जमकर प्रॉफिट बुकिंग की, जिससे गिरावट और तेज़ हो गई. फ़ाइनैंशियल टाइम्स लिखता है कि वार्श जैसे पारंपरिक अर्थशास्त्री का नेतृत्व महंगाई पर सख्त नियंत्रण ला सकता है, जो डॉलर को मजबूत और गोल्ड की मांग को प्रभावित कर सकता है.
ब्लूमबर्ग के अनुसार, गोल्ड-सिल्वर की गिरावट के बीच डॉलर ने तेजी पकड़ी, क्योंकि कमोडिटी करेंसी जैसे ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और स्वीडिश क्रोना दबाव में आ गईं. वार्श के नामांकन के बाद डॉलर में तेज़ उछाल देखा गया.
जेरोम पॉवेल का कार्यकाल मई में समाप्त हो रहा है, और उसी बीच ट्रंप प्रशासन व सीनेट डेमोक्रेट्स के बीच अस्थायी समझौते ने एक और शटडाउन के खतरे को टाल दिया.