बिहार में दही-चूड़ा पॉलिटिक्स! कांग्रेस के भोज में क्यों नहीं पहुंचा पार्टी का एक भी विधायक?
बिहार में मकर संक्रांति के मौके पर कांग्रेस कार्यालय में आयोजित दही-चूड़ा भोज से पार्टी के सभी छह विधायकों ने किनारा कर लिया. जेडीयू ने इसे लेकर कांग्रेस को घेरते हुए कहा है कि यह पार्टी में टूट का बड़ा संकेत है.
मकर संक्रांति की आहट के साथ ही बिहार की सियासत में दही-चूड़ा की चमक अचानक तेज हो गई है। इसी कड़ी में डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा 13 जनवरी को भव्य दही-चूड़ा भोज रखने जा रहे हैं, जहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर कई अहम मंत्री तक पहुंचने वाले हैं। इस राजनीतिक दावत के बीच कांग्रेस ने भी एक दिन पहले सदाकत आश्रम में अपना पारंपरिक दही-चूड़ा भोज कर माहौल गर्माने की कोशिश की।
लेकिन कांग्रेस का आयोजन उस वक्त चर्चा में आ गया जब उसके छह में से एक भी विधायक कार्यक्रम में नहीं आया। प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम और कई बड़े पदाधिकारी मौजूद रहे, मगर विधायकों की पूरी गैरहाजिरी ने सभी को चौंका दिया। भोज खत्म होने के बाद जब इस मुद्दे पर सवाल उठे, तो पार्टी नेतृत्व असहज नजर आया।
राजेश राम ने मीडिया के सवालों को गोलमोल जवाब देकर टाल दिया। उन्होंने कहा कि मकर संक्रांति के इस शुभ अवसर पर कांग्रेस का मकसद अपने केंद्रीय नेतृत्व—राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे—को यह संदेश देना है कि बिहार में संगठन मजबूत और सक्रिय है। हालांकि, विधायकों की गैरमौजूदगी पर उन्होंने चुप्पी साधे रखी।
उधर, कांग्रेस के विधायकों की दूरी ने राजनीतिक गलियारों में कयासों को और हवा दे दी है। एनडीए की अगुवाई कर रही जेडीयू ने इसे कांग्रेस की आंतरिक टूट का संकेत बताते हुए तंज कस दिया। पार्टी ने कहा कि कांग्रेस का “चूड़ा बासी हो गया और दही फट गया”, और यह भी दावा कर दिया कि खरमास खत्म होते ही कांग्रेस में बड़ी टूट तय है।
सियासी दावतों की इस होड़ में तेज प्रताप यादव भी पीछे नहीं हैं और वे भी अपना दही-चूड़ा भोज रखने की तैयारी में हैं। वहीं चिराग पासवान 15 जनवरी को इस पारंपरिक भोज के जरिए राजनीतिक संदेश देने की योजना बना चुके हैं। बिहार की राजनीति में दही-चूड़ा का यह संग्राम अब बड़ा रंग पकड़ता दिखाई दे रहा है।