ईरान युद्ध के बीच ट्रंप से खफा खाड़ी देश! दो बड़े मुद्दों पर बढ़ा जबरदस्त टकराव

मिडिल ईस्ट की जंग अब अमेरिका के लिए भी मुश्किल बनती दिख रही है. खाड़ी देशों का आरोप है कि यूएस और इजरायल ने ईरान पर हमले से पहले उन्हें भरोसे में नहीं लिया. अब ईरान के पलटवार में वही देश सबसे ज्यादा निशाने पर हैं, जिससे वॉशिंगटन और उसके अरब सहयोगियों के बीच नाराजगी बढ़ती जा रही है.

Mar 7, 2026 - 11:33
ईरान युद्ध के बीच ट्रंप से खफा खाड़ी देश! दो बड़े मुद्दों पर बढ़ा जबरदस्त टकराव

अमेरिका और ईरान के बीच शुरू हुई जंग अब अनिश्चितता की धुंध में घिरती जा रही है. हालात इतने तगड़े हो चुके हैं कि खाड़ी देशों में भी नाराजगी उबलने लगी है. उनका आरोप है कि अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर होने वाले बड़े हमले की कोई पूर्व सूचना नहीं दी, और अगर मिल जाती, तो वे अपने बचाव की तैयारी कर सकते थे. अचानक हुए पलटवार ने उन्हें चौकन्ना और परेशान कर दिया है.

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, दो खाड़ी देशों के शीर्ष अधिकारियों ने साफ कहा कि वे अमेरिका के युद्ध प्रबंधन से बेहद निराश हैं, खासकर 28 फरवरी को हुए शुरुआती हमले के बाद. उनका कहना है कि न तो उन्हें इस ऑपरेशन की जानकारी दी गई और न ही उनकी चेतावनियों को गंभीरता से लिया गया कि ये युद्ध पूरे क्षेत्र को तबाह कर सकता है. उनकी बातों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा.

एक अधिकारी ने तो ये तक कह दिया कि अमेरिका ने खाड़ी देशों की सुरक्षा को नजरअंदाज कर दिया है. उनके अनुसार, ऑपरेशन का फोकस सिर्फ अमेरिकी और इजरायली सुरक्षा पर रहा, जबकि खाड़ी देशों को मुश्किल हालात में खुद को संभालने के लिए छोड़ दिया गया. इंटरसेप्टर्स जैसी महत्वपूर्ण रक्षा प्रणाली भी तेजी से खत्म हो रही है, जिससे उनकी चिंता और बढ़ गई है.

इन अधिकारियों ने गोपनीयता की शर्त पर ये बातें बताते हुए साफ किया कि मामला बेहद संवेदनशील है. दूसरी ओर बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और यूएई से आधिकारिक बयान लेने की कोशिश की गई, लेकिन किसी ने भी प्रतिक्रिया नहीं दी. ये चुप्पी भी बहुत कुछ कह रही है.

अमेरिका और इजरायल पर खुला हमला

भले ही सरकारी बयान सामने न आए हों, लेकिन खाड़ी देशों से जुड़े प्रभावशाली चेहरे अमेरिका पर खुलकर निशाना साध रहे हैं. उनका आरोप है कि इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक खतरनाक और अनावश्यक जंग में ढकेल दिया है. ये आरोप अब वैश्विक बहस का हिस्सा बन चुके हैं.

सऊदी अरब के पूर्व जासूस प्रमुख प्रिंस तुर्की अल-फैसल ने तो सीएनएन पर कह दिया कि यह युद्ध पूरी तरह से नेतन्याहू की देन है, और किसी तरह उन्होंने ट्रंप को अपने एजेंडे का समर्थन करने के लिए मना लिया. यह बयान अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भूचाल की तरह फैल गया है.

उधर, पेंटागन ने भी सांसदों के साथ हुई गुप्त बैठक में माना कि वे ईरान के लगातार आ रहे ड्रोन हमलों से निपटने में संघर्ष कर रहे हैं. इन हमलों ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों समेत कई अहम लक्ष्यों को खतरे में डाल दिया है. सुरक्षा व्यवस्था डगमगाती दिख रही है.

ईरान की नजर में खाड़ी देश आसान निशाने हैं, क्योंकि वे उसकी कम दूरी की मिसाइलों की पहुंच में आते हैं. साथ ही इन जगहों पर अमेरिकी सेना के बेस भी मौजूद हैं. इससे ईरान के हमलों से तेल आपूर्ति में भारी अव्यवस्था पैदा हो रही है, जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है.

एपी के आंकड़ों के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान अब तक पांच खाड़ी देशों पर कम से कम 380 मिसाइलें और 1,480 से अधिक ड्रोन दाग चुका है. लोकल अधिकारियों का कहना है कि इन हमलों में कम से कम 13 लोगों की जान जा चुकी है. ये आंकड़े खुद बताते हैं कि हालात कितने भयावह हैं.

कुछ दिन पहले कुवैत में भी एक बड़ा हमला हुआ, जिसमें छह अमेरिकी सैनिक मारे गए. ईरानी ड्रोन ने सेना बेस से कई मील दूर स्थित एक ऑपरेशन सेंटर को निशाना बनाया था. इस घटना ने खाड़ी में अमेरिकी सुरक्षा ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

इतना ही नहीं, ईरान ने हाल ही में सऊदी अरब पर भी सीधा हमला किया, जिसमें रियाद स्थित अमेरिकी दूतावास को लक्ष्य बनाया गया. ये कदम खतरे को कई गुना बढ़ा चुका है और पूरे क्षेत्र में भय का माहौल पैदा हो गया है.