SIR प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट सख़्त! ममता की याचिका पर दो टूक, ‘किसी भी तरह की बाधा बर्दाश्त नहीं’

सुप्रीम कोर्ट पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन SIR के खिलाफ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की याचिका पर सुनवाई कर रहा है। ममता ने 1.36 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम गलत स्पेलिंग या पते बदलने के कारण हटाने की आशंका जताई है। उन्होंने चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त 8,300 माइक्रो-ऑब्जर्वर पर भी सवाल उठाए हैं, जिन्हें केंद्र सरकार के अधिकारी बताया गया है। कोर्ट ने बंगाल सरकार से अधिकारियों के नाम भेजने में देरी पर सवाल किया।

Feb 9, 2026 - 18:14
SIR प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट सख़्त! ममता की याचिका पर दो टूक, ‘किसी भी तरह की बाधा बर्दाश्त नहीं’

देश की सबसे ऊंची अदालत ने सोमवार को एक बेहद सख्त संदेश देते हुए साफ कर दिया कि विशेष गहन मतदाता सूची संशोधन (SIR) प्रक्रिया में अब किसी भी तरह की रुकावट या राजनीतिक दखल को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह बयान उस समय आया जब सुप्रीम कोर्ट पश्चिम बंगाल में जारी SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली अहम याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने पूरे जोर के साथ कहा कि SIR प्रक्रिया हर हाल में बिना किसी व्यवधान, बिना किसी दबाव और बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के पूरी की जानी चाहिए। अदालत ने सभी राज्यों को स्पष्ट चेतावनी दी कि इस प्रक्रिया में सहयोग करें, वरना कड़े निर्देश जारी किए जा सकते हैं।

सुनवाई के दौरान कोर्ट पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की उस याचिका पर भी विचार कर रहा था, जिसमें उन्होंने मतदाता सूची में मौजूद ‘तार्किक विसंगतियों’ को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे। इन मुद्दों पर गहराई से चर्चा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने SIR प्रक्रिया की समय-सीमा में एक सप्ताह की अतिरिक्त मोहलत दे दी है।

ममता बनर्जी ने अदालत में दावा किया कि मतदान सूची में 1.36 करोड़ से अधिक नाम ऐसे हैं जिन्हें चुनाव आयोग ने 'लॉजिकल एरर' बताकर संदेह के दायरे में रखा है, और यह संख्या किसी भी राज्य की राजनीति को हिलाने के लिए काफी है।

उनका कहना है कि गलत स्पेलिंग, शादी के बाद बेटियों के पते बदलने या अन्य तकनीकी त्रुटियों की वजह से लाखों लोगों के वोट काटे जाने की आशंका बन रही है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह सब योजनाबद्ध ढंग से किया जा रहा है, जिससे मतदाताओं के अधिकारों पर सीधा प्रहार हो रहा है।

यही नहीं, ममता ने चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त किए गए 8,300 माइक्रो-ऑब्जर्वर्स पर भी सवाल उठाए और दावा किया कि इनमें से अधिकांश केंद्र सरकार के अधिकारी हैं। उनकी मान्यता है कि इनकी तैनाती बिना संवैधानिक अधिकार और पूरी प्रक्रिया को प्रभावित करने की नीयत से की गई है, जिसके जरिये वोटर्स के नाम हटाने की कोशिशें की जा रही हैं।

इसी बीच सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर यह आरोप भी लगाया गया कि ममता बनर्जी का व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना और SIR मामले पर बहस करना संवैधानिक रूप से अनुचित है। चार फरवरी को वह सुप्रीम कोर्ट में दलील देने वाली देश की पहली सेवारत मुख्यमंत्री बनी थीं, जिसने देशभर में जोरदार चर्चा छेड़ दी।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजानिया की तीन जजों की पीठ ने सोमवार को इस पूरे मामले पर विस्तार से सुनवाई की, जिसमें ममता बनर्जी की वह याचिका भी शामिल थी जो चुनाव आयोग की SIR कवायद का जोरदार विरोध करती है।

सतीश कुमार अग्रवाल, जो अखिल भारत हिंदू महासभा के पूर्व उपाध्यक्ष रह चुके हैं, ने याचिका दायर कर इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि ममता की याचिका किसी निजी विवाद से नहीं जुड़ी, बल्कि यह राज्य शासन और चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकारों से संबंधित एक बड़ा मुद्दा है।

अग्रवाल का तर्क है कि मुख्यमंत्री व्यक्तिगत क्षमता का दावा नहीं कर सकतीं, क्योंकि यह मामला पूरे राज्य और उसकी प्रशासनिक जिम्मेदारियों से जुड़ा है। इसलिए बंगाल का प्रतिनिधित्व केवल अधिकृत वकीलों द्वारा ही होना चाहिए और वे पहले से ही अदालत में मौजूद हैं।