एक संत, एक बयान और संघ-बीजेपी की एकजुटता - अविमुक्तेश्वरानंद एपिसोड ने सब बदल दिया

माघ मेले में पालकी पर जाने से रोके गए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का धरना जारी है. तबीयत भी बिगड़ रही है, और विवाद थम नहीं रहा है. असल में, वो धर्म और राजनीति के घालमेल के शिकार हैं, और जब तक अपना स्टैंड पर फोकस नहीं करते ये सिलसिला चलता रहेगा.

Jan 24, 2026 - 11:11
एक संत, एक बयान और संघ-बीजेपी की एकजुटता - अविमुक्तेश्वरानंद एपिसोड ने सब बदल दिया

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती एक बार फिर सुर्खियों के तूफान के बिलकुल बीचोंबीच आ गए हैं. बीते वर्षों में भी विवाद उनका पीछा करते रहे हैं—कभी वाराणसी में पुलिस की लाठियां झेलनी पड़ीं, तो अब प्रयागराज प्रशासन उनसे उनके ही शंकराचार्य पद का सबूत मांग रहा है. हालात ऐसे बन गए हैं कि इस संघर्ष में वह फिर से अकेले पड़ते दिखाई दे रहे हैं.

जब देश की राजनीति पर धर्म का प्रभाव पहले से कहीं ज्यादा गहरा होता जा रहा है, तभी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती खुद राजनीति की तगड़ी उलझनों में घिरते नज़र आ रहे हैं. कुछ लोग तो संत के वस्त्रों में उन्हें असुर जैसा बताने लगे हैं, और दिलचस्प ये है कि इन स्थितियों के लिए थोड़ी बहुत जिम्मेदारी खुद उन्हीं पर भी डाली जा रही है.

माघ मेले में प्रवेश रोक दिए जाने के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद धरने पर अड़े हुए हैं, और अब साधु-संतों का समाज भी इस विवाद में दो हिस्सों में बंट गया है. अविमुक्तेश्वरानंद और जगद्गुरु रामभद्राचार्य के बीच खुलेआम आरोप-प्रत्यारोप चल रहे हैं, जिससे मामला और भी पेचीदा हो गया है.

सबसे गंभीर स्थिति तो तब बनी, जब अविमुक्तेश्वरानंद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निशाने पर आ गए. यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो अपने संबोधन में इशारों ही इशारों में उन्हें रामायण के कुख्यात असुर ‘कालनेमि’ जैसा कहकर विवाद को और भड़का दिया.

धरने का पांचवां दिन, स्वास्थ्य बिगड़ने की खबर

18 जनवरी मौनी अमावस्या पर जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद संगम स्नान के लिए पहुंचे, तो प्रशासन ने उन्हें पालकी के साथ अंदर जाने नहीं दिया. इसके बाद पुलिस और समर्थकों के बीच तनाव बढ़ा, और स्वामी वहीं धरने पर बैठ गए. अब पांच दिन गुजर चुके हैं, और खबर है कि उनकी तबीयत काफी खराब हो चुकी है—तेज बुखार में वैनिटी वैन तक से बाहर नहीं निकल पा रहे.

उनका कहना है कि जब तक प्रशासन उनसे माफी नहीं मांगता, वे स्नान नहीं करेंगे. साथ ही सवाल उठाते हैं कि जब मौनी अमावस्या पर स्नान ही नहीं हो पाया, तो वसंत पंचमी का स्नान कैसे कर लें? उनकी ओर से कानूनी जवाब भी भेजा जा चुका है, जिसमें कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश उन पर लागू नहीं होता क्योंकि उनका पट्टाभिषेक आदेश जारी होने से दो दिन पहले ही हो चुका था.

राजनीति में उलझते गए स्वामी

माघ मेले की रोक-टोक के बाद समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने अविमुक्तेश्वरानंद से बात की और कहा कि किसी साधु का अपमान समाजवादी पार्टी बर्दाश्त नहीं करेगी. बस इतना कहना ही काफी था कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तीखा जवाब दे डाला और मामला अचानक राजनीतिक विस्फोट में बदल गया.

हरियाणा के एक धार्मिक कार्यक्रम में योगी आदित्यनाथ ने संकेत देते हुए कहा कि धर्म और राष्ट्र सन्यासी का सर्वोच्च धर्म हैं, और ऐसे कई ‘कालनेमि’ धर्म की आड़ में सनातन को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने लोगों से सतर्क रहने की अपील भी की.

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने भी योगी आदित्यनाथ पर पलटवार किया. उनका कहना है कि कालनेमि वह होता है जो खुद को वह बताता है जो वह है ही नहीं. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री होकर अगर कोई खुद को धर्माचार्य बताने लगे, तो असल कालनेमि वही साबित होता है. कोई व्यक्ति एक समय में दो भूमिकाएं निभा ही नहीं सकता.

ऐसा माना जा रहा है कि अखिलेश यादव की सहानुभूति स्वीकार कर उन्होंने अनजाने में बीजेपी और योगी आदित्यनाथ से टकराव मोल ले लिया—और इसी कदम से वे सीधे संघ की आलोचना के दायरे में भी आ गए.

संघ के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार ने भी बिना नाम लिए योगी के बयान का समर्थन किया और कहा कि जहां देवत्व हो, वहां राक्षसी शक्तियां अधिक देर टिक नहीं पातीं. उनके मुताबिक मेले में किसी तरह की शरारत की कोशिश की गई, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली.

अविमुक्तेश्वरानंद पर लगे दुर्व्यवहार के आरोपों को भी इंद्रेश कुमार नकारते नजर आए. उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर हुआ ही क्या है जिसे दुर्व्यवहार कहा जा रहा है, जबकि कुछ लोग सरकार और व्यवस्था पर अनावश्यक दोषारोपण कर रहे हैं.