एक घूंट और दिमाग का कंट्रोल खत्म! क्यों शराब छोड़ना बन जाता है सबसे मुश्किल जंग? साइंस ने खोले राज़

2019 में भारत में शराब की वजह से 3.40 लाख लोगों की जानें गई। 'Why We Drink Too Much: The Impact of Alcohol on Our Bodies and Culture' नाम की किताब में डॉक्टर चार्ल्स नोल्स ने बताया है कि शराब की लत क्यों पड़ती है।

Jan 12, 2026 - 11:44
एक घूंट और दिमाग का कंट्रोल खत्म! क्यों शराब छोड़ना बन जाता है सबसे मुश्किल जंग? साइंस ने खोले राज़

साल 2000 से 2018 के बीच भारत में शराब की खपत ने ऐसा उछाल मारा कि आंकड़े देखकर कोई भी चौंक जाए। जहां दो दशक पहले प्रति व्यक्ति खपत महज़ 2.3 लीटर थी, वहीँ 2018 तक बढ़कर 5.5 लीटर तक पहुंच गई। करीब 35 बिलियन डॉलर के वैल्यू वाला भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा अल्कोहल मार्केट बन चुका है। 2019 के सरकारी सर्वे ने भी चौंकाया था कि 10 से 75 साल की उम्र के हर सात में से एक भारतीय शराब का सेवन करता है। बढ़ती कमाई, शहरी जीवन और बदलती जीवनशैली ने इस खपत को तेज़ी से बढ़ाया है, लेकिन इसका अंधेरा सच भी उतना ही कड़वा है।

'Why We Drink Too Much: The Impact of Alcohol on Our Bodies and Culture' में डॉक्टर चार्ल्स नोल्स ने बताया कि शराब की लत आखिर पकड़ती क्यों है और छूटती क्यों नहीं। वह अपने निजी अनुभवों के जरिए बताते हैं कि कैसे शराबखोरी ने उनकी शादीशुदा जिंदगी को टूटने की कगार पर ला दिया और वह एक अच्छे पिता भी नहीं बन पाए। वह यह भी स्वीकारते हैं कि नशे की हालत में उन्हें खुद का होश तक नहीं रहता था और कई बार जीवन खत्म करने जैसे खतरनाक खयाल भी आए। उनकी कहानी पढ़कर समझ आता है कि शराब सिर्फ शरीर को नहीं, पूरे जीवन को हिलाकर रख देती है।

किताब में दिए गए व्यक्तिगत अनुभव इसे सिर्फ एक वैज्ञानिक विश्लेषण बनने से रोकते हैं और इसे बेहद भावनात्मक और असरदार बना देते हैं। चार्ल्स बताते हैं कि कैसे शराब की लत धीरे-धीरे इंसान के रिश्तों, मानसिक शांति और आत्मविश्वास को चाटती चली जाती है। हर घूंट आपको तबाही के और करीब ले जाता है। उनकी साफ राय है कि शराब आज दुनिया का सबसे पसंदीदा ड्रग है—चाहे जश्न मनाना हो, सामाजिक मेलजोल बढ़ाना हो या दर्द दबाना हो। लेकिन इसी पसंद की आड़ में इसके नुकसान हमेशा छिप जाते हैं।

इस किताब में चार्ल्स शराब छोड़ने के टिप्स देने के बजाय यह बताते हैं कि यह दिमाग और शरीर के भीतर कैसी उथल-पुथल पैदा करती है। वह स्पष्ट करते हैं कि कई लोग तो सिर्फ सोशलाइजेशन के लिए पीना शुरू करते हैं, लेकिन धीरे-धीरे यह आदत नियंत्रण से बाहर हो जाती है। उन्होंने यह भी समझाया है कि कुछ लोग शराब में आनंद क्यों महसूस करते हैं जबकि कुछ को इसका स्वाद तक पसंद नहीं आता। इसके पीछे जेनेटिक्स, माहौल और समाज द्वारा बनाई गई उम्मीदों का बड़ा हाथ होता है।

इन रहस्यों को खोलने के लिए चार्ल्स ने न्यूरोसाइंस और एपिडेमियोलॉजी जैसी जटिल साइंस का सहारा लिया, लेकिन भाषा इतनी आसान रखी है कि अनजान पाठक भी सब समझ सके। वह बताते हैं कि जेनेटिक वेरिएंट्स शराब को शरीर में कैसे तोड़ते हैं, तनाव कैसे नशे की ओर धकेलता है और रोमांच की चाह कैसे शराब की लत पैदा करती है। यानी शराबखोरी की कोई एक वजह नहीं होती, बल्कि कई कारण मिलकर इसे जन्म देते हैं।

चार्ल्स आधुनिक दुनिया की उस संस्कृति पर भी चोट करते हैं, जो हर जश्न और हर ऑफिस पार्टी में शराब को मुख्य केंद्र बना देती है। वह बताते हैं कि विज्ञापन इंडस्ट्री किस तरह आकर्षक पैकेजिंग और ग्लैमरस इमेज बनाकर लोगों को पीने के लिए प्रेरित करती है। वह शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं हैं और न ही किसी चमत्कारिक “30 दिनों में इलाज” का दावा करते हैं। लेकिन उन्होंने ऐसे तथ्य सामने रखे हैं जो किसी भी पढ़ने वाले को सोचने पर मजबूर कर दें कि शराब के साथ उसका रिश्ता आखिर कैसा है—दोस्ती का या विनाश का।