भारत के लिए क्यों अहम मानी जा रही है तारिक रहमान की वापसी? 5 प्वाइंट में समझें

बांग्लादेश चुनाव में बीएनपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, तारिक रहमान नए प्रधानमंत्री होंगे। भारत इसे चुनौती से अधिक संतुलित अवसर मानता है। पीएम मोदी ने रहमान को बधाई दी, सहयोग पर जोर दिया। जमात-ए-इस्लामी को बहुमत न मिलना, बांग्लादेश की आर्थिक चुनौतियां, भारत की पूर्व संपर्क पहल और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाएं इसके प्रमुख कारण हैं, जो बदलते वैश्विक परिदृश्य में रणनीतिक संतुलन स्थापित करेंगे।

Feb 13, 2026 - 11:24
भारत के लिए क्यों अहम मानी जा रही है तारिक रहमान की वापसी? 5 प्वाइंट में समझें

बांग्लादेश में बदलती सत्ता समीकरणों ने भारत के लिए सहयोग और साझेदारी का एक नया दरवाज़ा खोल दिया है (फोटो रॉयटर्स)

जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। बांग्लादेश के आम चुनावों ने दक्षिण एशिया की राजनीति में बड़ा भूचाल ला दिया है। बीएनपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है जबकि जमात-ए-इस्लामी स्पष्ट बहुमत से दूर रह गई, जिससे क्षेत्रीय सत्ता संतुलन में नई हलचल पैदा हुई है। आवामी लीग की अनुपस्थिति ने इस चुनाव को ऐतिहासिक रूप से अलग बना दिया है। पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान अब देश की कमान संभालने वाले हैं।

बदलते वैश्विक समीकरणों और बांग्लादेश की आर्थिक चुनौतियों को देखते हुए यह परिणाम भारत के लिए नई उम्मीद की तरह हैं। नई दिल्ली ने भी संकेत दे दिया है कि वह तारिक रहमान के नेतृत्व वाली सरकार के साथ तालमेल बढ़ाने को तैयार है।

चुनाव परिणाम स्पष्ट होते ही पीएम नरेंद्र मोदी ने तारिक रहमान को बधाई दी और कहा कि बांग्लादेश की जनता ने उनके नेतृत्व पर भरोसा दिखाया है। प्रधानमंत्री ने यह भी वादा किया कि भारत हमेशा एक लोकतांत्रिक, स्थिर और प्रगतिशील बांग्लादेश के साथ खड़ा रहेगा और दोनों देशों के बीच बहुआयामी सहयोग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए तैयार है।

बीएनपी के पिछले कार्यकाल भारत के लिए ज्यादा सहज नहीं रहे थे, लेकिन फिर भी भारत के रणनीतिक हितों की दृष्टि से यह स्थिति जमात-ए-इस्लामी के मुकाबले कहीं बेहतर मानी जा रही है। जमात-ए-इस्लामी का पाकिस्तान समर्थक राजनीति और कट्टरपंथी समूहों के प्रति झुकाव लंबे समय से भारत के लिए चिंता का कारण रहा है। यदि उसे बहुमत मिलता, तो भारत की पूर्वोत्तर सीमाओं पर खतरे कई गुना बढ़ सकते थे।

हालांकि इस चुनाव में जमात ने भारत को लेकर नरम रुख दिखाने की कोशिश की, लेकिन उसका पुराना इतिहास भारत विरोधी नारों और उग्र रैलियों से भरा रहा है। बहुमत न मिलना इस बात का संकेत है कि बांग्लादेश के मतदाता कट्टरपंथी राजनीति को पूर्ण समर्थन देने के लिए तैयार नहीं हैं। इससे भारत को सुरक्षा मोर्चे पर तत्काल राहत मिली है।

बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था इस समय भारी दबाव में है—विदेशी मुद्रा की कमी, निर्यात में गिरावट और मुद्रास्फीति ने हालात कठिन बना दिए हैं। ऐसे माहौल में बीएनपी सरकार के लिए सबसे पहली चुनौती अर्थव्यवस्था को स्थिर करना होगी। भारत-बांग्लादेश के बीच बीते दशक में व्यापार, ऊर्जा सहयोग, बिजली आपूर्ति, रेलवे-कनेक्टिविटी और पाइपलाइन प्रोजेक्ट जैसे कई अहम क्षेत्रों में अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। भारतीय कंपनियों का निवेश भी लगभग पांच अरब डॉलर तक पहुंच चुका है।

नई सरकार के लिए इन परियोजनाओं को जारी रखना मजबूरी नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक जरूरत है। बीएनपी के घोषणा पत्र में भी भारत के प्रति किसी टकरावपूर्ण नीति का संकेत नहीं दिया गया, जिससे यह साफ होता है कि पार्टी आर्थिक हितों को प्राथमिकता देना चाहती है। भारत की निवेश क्षमता और ऊर्जा सहयोग बांग्लादेश की आर्थिक पुनर्बहाली के लिए जीवनरेखा साबित हो सकते हैं।

दिल्ली ने पिछले महीनों में यह रणनीति बना ली थी कि वह आवामी लीग से आगे बढ़कर हर राजनीतिक दल से संवाद के रास्ते खोले रखेगी। बैकचैनल संपर्क, राजनयिक बातचीत और राजनीतिक स्तर पर संतुलित संदेशों ने इस समय सत्ता परिवर्तन को सहज बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर का खालिदा जिया के निधन के बाद ढाका जाना और भारतीय संसद में उनके लिए शोक प्रस्ताव पारित होना इस बड़े कूटनीतिक प्रयास का हिस्सा था। इस तैयारी का लाभ अब साफ दिखाई दे रहा है—नई सरकार के लिए भारत-विरोधी रुख अपनाना आसान बिल्कुल नहीं है।

भारत और बांग्लादेश के रिश्ते केवल राजनीति तक सीमित नहीं, बल्कि भूगोल और अर्थव्यवस्था के जरिए गहराई से जुड़े हैं। पूर्वोत्तर भारत की कनेक्टिविटी बांग्लादेश के मार्गों और जलमार्गों पर काफी निर्भर करती है। सीमा हाट, सड़क कॉरिडोर, रेल नेटवर्क और कार्गो रूट दोनों देशों के स्थानीय कारोबार को मजबूत करते हैं।

ऐसे में बीएनपी के लिए इन परियोजनाओं को रोकना आर्थिक आत्मघाती कदम साबित होगा। इसके विपरीत, इन्हें आगे बढ़ाने से उसे घरेलू स्तर पर विकासकारी सरकार की पहचान भी मिल सकती है—जो उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक जीत होगी।