ICC कर दे पाकिस्तान के साथ ‘खेला’! T20 वर्ल्ड कप का बायकॉट पड़ा भारी तो बांग्लादेश की खुल सकती है किस्मत

प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच बढ़ा विवाद अब यूपी की सियासत का बड़ा मुद्दा बन गया है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘कालनेमी’ वाले बयान के बाद डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य का संतों के प्रति नरम और सम्मानजनक रुख सामने आया. दोनों बयानों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह मतभेद है या सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है.

Jan 27, 2026 - 13:48
ICC कर दे पाकिस्तान के साथ ‘खेला’! T20 वर्ल्ड कप का बायकॉट पड़ा भारी तो बांग्लादेश की खुल सकती है किस्मत

प्रयागराज के माघ मेले में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच उठी टकराहट अब सूबे की सियासत के शीर्ष नेताओं तक पहुंच चुकी है। हालात ऐसे हैं कि बयानबाज़ी की आग विधानसभा गलियारों से लेकर साधु-संतों के शिविरों तक लपटें मार रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘कालनेमि’ वाले तीखे वार और उसके उलट डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य की नरम झुकाव भरी प्रतिक्रिया ने राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। यह विवाद अब सिर्फ मेला प्रशासन का नहीं, बल्कि सत्ता के बड़े खिलाड़ियों के आमने-सामने खड़े होने की कहानी बनता जा रहा है।

योगी का ‘कालनेमि’ हमला: निशाने पर कौन?

सीएम योगी ने अपने हालिया संबोधन में रामचरितमानस के कुख्यात पात्र ‘कालनेमि’ का उदाहरण देकर माहौल गर्म कर दिया। कालनेमि, जो साधु का रूप धरकर हनुमान जी को भ्रमित करने निकला था—उसका जिक्र योगी ने माघ मेले को ‘यज्ञ’ मानते हुए किया, मानो यह संदेश दे रहे हों कि इस पुण्य आयोजन में रुकावट डालने वाला कोई भी व्यक्ति कालनेमि की श्रेणी में आता है। इस टिप्पणी ने राजनीतिक तापमान और अधिक बढ़ा दिया।

विशेषज्ञ इसे विपक्ष के खिलाफ बयान के रूप में भी देख रहे हैं, लेकिन समय और परिस्थितियों के लिहाज से इसे सीधे शंकराचार्य विवाद से जोड़ा जा रहा है। प्रशासन और मुख्यमंत्री दोनों ही इस मामले में पीछे हटने या नरमी दिखाने के मूड में बिल्कुल नहीं दिखते, जिससे मामला और पेचीदा हो गया है।

केशव मौर्य का अलग सुर: क्या पर्दे के पीछे कोई ‘ट्रैक-2’ चाल?

मुख्यमंत्री के सख्त तेवरों के उलट डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने अचानक माहौल में नरमी घोलते हुए शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को ‘पूज्य संत’ कहकर उनके प्रति सम्मान जताया। इतना ही नहीं, उन्होंने साफ कहा कि शंकराचार्य के साथ जो भी हुआ, उसकी जांच होगी, और वे उनके चरणों में प्रणाम भी करते हैं। यह बयान सत्ता गलियारों में एक बिल्कुल अलग संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह सिर्फ मतभेद नहीं, बल्कि बीजेपी और संघ परिवार की गुप्त रणनीति यानी ‘ट्रैक-2 डिप्लोमेसी’ का हिस्सा भी हो सकता है। केशव मौर्य की संत समाज में मजबूत पकड़ और विश्व हिंदू परिषद से जुड़ा उनका बैकग्राउंड बताता है कि शायद उनकी भूमिका शांतिदूत की तरह तय की गई हो। ऐसे में जब प्रशासन और मुख्यमंत्री अपनी जगह अडिग हैं, मौर्य संत समाज की नाराज़गी ठंडा करने की जिम्मेदारी निभा रहे हों—ऐसा माना जा रहा है।

क्या यूपी की सत्ता में खींचतान? इंजन भिड़े या डब्बे हिले?

इस घटनाक्रम ने विपक्ष को मौका दे दिया है कि वह सवाल उठाए कि क्या यूपी सरकार का मशहूर ‘डबल इंजन मॉडल’ अब अंदरूनी टकराव का शिकार हो रहा है। एक तरफ प्रशासन शंकराचार्य के शिविर पर नोटिस चस्पा कर अपना कड़ा रवैया दिखा रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकार के नंबर दो पद पर बैठे मौर्य का सौम्य बयान दोनों पटरियों के बीच गहराते फासले की ओर संकेत करता है।

यह केशव मौर्य की निजी राय है या संघ परिवार की चालाकी से बुना गया बड़ा प्लान—यह आने वाले दिनों में साफ होगा। लेकिन इतना जरूर है कि शंकराचार्य का अनशन, सीएम योगी का आक्रामक रुख और मौर्य की शांतिपूर्ण भाषा—तीनों मिलकर यूपी की राजनीति में जबरदस्त उबाल पैदा कर चुके हैं।