यूसुफ पठान, शत्रुघ्न सिन्हा और... आ गई TMC के बागी सांसदों की लिस्ट! कुछ नाम तो चौंका देंगे
ममता बनर्जी का साथ छोड़ने वाले 19 सांसदों की लिस्ट सामने आई. इसमें काकोली घोष दस्तीदार, यूसुफ पठान, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नाम शामिल हैं. सायोनी घोष का नाम भी इसमें शामिल है. कहा जा रहा है कि वो भी इस गुट के साथ हैं.
टीएमसी में मची हलचल अब कयासों से निकलकर हकीकत का रूप ले चुकी है. वो आंकड़ा, जिसकी हर कोई अलग-अलग भविष्यवाणी कर रहा था—कहीं 10 तो कहीं 20—आखिरकार सामने आ गया है. पूरे 19 सांसदों की चौंका देने वाली सूची ने बंगाल की राजनीति में भूचाल ला दिया है. काकोली घोष दस्तीदार से लेकर यूसुफ पठान और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे बड़े नामों ने सबको हैरानी में डाल दिया है. खास बात यह है कि जिन नेताओं के बारे में केवल अटकलें थीं, उनमें सायोनी घोष जैसे नाम भी अब साफ तौर पर सामने आ चुके हैं.
1. यूसुफ पठान (बहरामपुर) पूर्व क्रिकेट स्टार और अब बहरामपुर में कांग्रेस के किले को ध्वस्त करने वाले यूसुफ पठान की नाराज़गी किसी से छिपी नहीं रही. दीदी ने जिस भरोसे के साथ उन्हें मैदान में उतारा था, उसी मैदान पर स्थानीय टीएमसी नेताओं ने उनका साथ नहीं दिया. संगठन से बढ़ती दूरी ने उनके मन में गहरी कड़वाहट पैदा कर दी है, जो अब खुलकर सामने आने लगी है.
2. जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया (कूचबिहार) उत्तर बंगाल की राजनीति के केंद्र में रहने वाली कूचबिहार सीट से जगदीश बसुनिया लंबे समय से राजबंशी समाज के मजबूत स्तंभ रहे हैं. लेकिन हाल के महीनों में पार्टी की अंदरूनी राजनीति और गुटबाज़ी ने उनके सुर बदल दिए हैं. क्षेत्रीय पकड़ होने के बावजूद संगठन के साथ टकराव ने उनकी असंतुष्टि को और भड़का दिया है.
3. खलीलुर रहमान (जंगीपुर) बीड़ी उद्योग से राजनीति की ओर आए खलीलुर रहमान की पकड़ जंगीपुर में बेहद मजबूत रही है. मुस्लिम बहुल क्षेत्र में उनके प्रभाव को कोई चुनौती नहीं मिली थी, लेकिन केंद्रीय एजेंसियों की जांच और स्थानीय नेतृत्व से बिगड़ते संबंधों ने माहौल को गर्म कर दिया है. खबरें हैं कि उनका टीएमसी से मोहभंग अब लगभग तय हो चुका है.
4. अबू ताहेर खान (मुर्शिदाबाद) मुर्शिदाबाद के सियासी दिग्गज अबू ताहेर खान का नाम इस सूची में देखकर पार्टी के भीतर खलबली मचना स्वाभाविक है. कांग्रेस से टीएमसी में आने के बाद उन्होंने अपने क्षेत्र में गहरी जड़ें जमाईं, लेकिन हालिया उपेक्षा और नए चेहरों को दी जा रही तरजीह ने उन्हें काफी नाराज़ कर दिया है. उनका असंतोष अब बगावत की दहलीज पर पहुंच चुका है.
5. पार्थ भौमिक (बैरकपुर) बैरकपुर की विवादों से भरी सीट पर जीत हासिल करने वाले पार्थ भौमिक, जिन्हें कभी ममता बनर्जी के बेहद करीबी माना जाता था, अब पार्टी से दूरी बनाते दिखाई दे रहे हैं. अर्जुन सिंह के साथ लंबे समय से चली आ रही खींचतान और गुटीय समीकरणों में हुए बदलाव ने उनके धैर्य की परीक्षा ले ली है. उनके सुर अब साफ तौर पर विद्रोही होते दिख रहे हैं.
6. काकोली घोष दस्तीदार (बारासात) तेजतर्रार आवाज़ और संसद में दमदार उपस्थिति के लिए मशहूर काकोली घोष दस्तीदार का असहज होना पार्टी के लिए बड़ा संकेत है. अभिषेक बनर्जी के बढ़ते दखल और युवा ब्रिगेड के फैसलों ने उन्हें भीतर ही भीतर परेशान किया है. ऐसा कहा जा रहा है कि पार्टी नेतृत्व से उनकी दूरी अब बहुत बढ़ चुकी है.
7. बापी हलदार (मथुरापुर) मथुरापुर से आने वाले जमीनी नेता बापी हलदार सुंदरबन क्षेत्र में बेहद लोकप्रिय रहे हैं. लेकिन हालिया पंचायत चुनावों और फंड आवंटन को लेकर जिला नेतृत्व से उनकी तकरार लगातार गहराती चली गई है. यह विवाद अब इतने बड़े स्तर पर पहुंच चुका है कि बगावत लगभग तय मानी जा रही है.
8. सायोनी घोष (जादवपुर) टीएमसी की युवा ब्रिगेड की चमकदार चेहरा रही सायोनी घोष की बगावत ने सभी को हैरत में डाल दिया है. जादवपुर की प्रतिष्ठित सीट से जीतकर संसद पहुंचीं सायोनी संगठन के नए फैसलों से बेहद असंतुष्ट बताई जा रही हैं. उनकी नाराज़गी पार्टी के अंदर बड़े बदलाव का संकेत मानी जा रही है.
9. माला रॉय (कोलकाता दक्षिण) कोलकाता दक्षिण, जो कभी ममता बनर्जी का अजेय गढ़ माना जाता था, वहां से माला रॉय का इस सूची में होना टीएमसी को गहरे सियासी संकट की ओर धकेल रहा है. नगर निगम से लेकर सांसद फंड तक, कई मुद्दों पर पार्टी शीर्ष नेतृत्व से उनके मतभेद तीखे हो चुके हैं. इस असंतोष ने संगठन की नींव हिला दी है.
10. मिताली बाग (आरामबाग) आरामबाग की कड़े मुकाबले वाली सीट से उभरकर आई मिताली बाग साधारण पृष्ठभूमि के बावजूद जनता से सीधा जुड़ाव रखती हैं. लेकिन सांसद बनने के बाद स्थानीय टीएमसी नेताओं की भीतरघात और लगातार उपेक्षा ने उन्हें तोड़ दिया. अब वह साफ कर चुकी हैं कि वह अपने राजनीतिक रास्ते खुद तय करेंगी.
11. देव अधिकारी (घाटाल) बंगाली सिनेमा के सुपरस्टार देव का राजनीतिक संघर्ष अब नई दिशा पकड़ रहा है. कई बार राजनीति छोड़ने की इच्छा जताने वाले देव को ममता बनर्जी ने मनाया जरूर था, लेकिन घाटाल के नेताओं की कथित भ्रष्ट गतिविधियों ने उनका मन पूरी तरह बदल दिया है. वह इस बार समझौते के मूड में नहीं दिख रहे.
12. कालीपद सोरेन (झाड़ग्राम) संथाली साहित्य के सम्मानित स्तंभ और झाड़ग्राम के जाने-माने आदिवासी नेता कालीपद सोरेन की नाराज़गी बेहद गंभीर मानी जा रही है. क्षेत्र की बुनियादी समस्याओं पर पार्टी की उदासीनता और अधूरे वादों ने उन्हें टीएमसी से दूर कर दिया है. उनकी बगावत से जंगलमहल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.