राम मंदिर चढ़ावा चोरी पर SIT का खुलासा: कपड़ों और जूतों में छुपाकर ले जाते थे नोटों के बंडल
एसआईटी ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में बताया है कि चढ़ावा की गिनती वाले कक्ष में बड़ी लापरवाही बरती जाती थी। कई कर्मचारी कपड़ों और जूतों में नोटों के बंडल को छिपा लेते थे। निगरानी प्रणाली में भी बड़ी गड़बड़ियां पाई गई हैं। , India News in Hindi - Hindustan
राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी और गबन के मामले में एसआईटी की शुरुआती जांच ने सबको चौंका देने वाला खुलासा कर दिया है। टीम ने पाया कि दान की गिनती और उसकी सुरक्षा से जुड़ी कई बड़ी लापरवाहियां लंबे समय से अनदेखी की जा रही थीं। निगरानी के बेहद कमज़ोर इंतज़ाम और प्रोटोकॉल की अनदेखी ने हालात को और गंभीर बना दिया। यह प्रारंभिक रिपोर्ट श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को सौंप दी गई है, हालांकि विस्तृत अंतिम रिपोर्ट 15 जुलाई को सामने आएगी।
रिपोर्ट में बताया गया कि 27 अप्रैल से 5 जून के बीच के सीसीटीवी फुटेज में कई कर्मचारियों को नोटों की गड्डियां और खुली नकदी अपने कपड़ों, जेबों और यहां तक कि जूतों में छुपाते देखा गया। करीब 70 बार ऐसी संदिग्ध गतिविधियां रिकॉर्ड हुईं, जो किसी आकस्मिक हरकत नहीं बल्कि लगातार कई दिनों तक चलने वाली एक सुनियोजित प्रक्रिया की ओर इशारा करती हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि 27 अप्रैल से पहले का फुटेज उपलब्ध ही नहीं है, जिससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि चोरी पहले से बड़े पैमाने पर हो रही थी।
पुराना सीसीटीवी डेटा स्टोरेज लिमिट के चलते ऑटो-डिलीट हो चुका था, जिससे कई अहम सुराग हाथ से निकल गए। एसआईटी ने पाया कि गिनती कक्ष में तय सुरक्षा नियमों को बिल्कुल नजरअंदाज कर दिया गया था। न तो कर्मचारियों की तलाशी ली जाती थी, न उनके निजी सामान पर नियंत्रण था, कई दानपात्रों की नकदी एक साथ गिनी जाती थी और कीमती चढ़ावे का रिकॉर्ड भी बेहद लापरवाही से रखा जा रहा था।
रिपोर्ट में अविनाश शुक्ला, अनुकूल मिश्रा, लव कुश मिश्रा, मनीष कुमार यादव, करुणेश पांडेय और राम शंकर मिश्रा को प्रमुख रूप से संदिग्धों की सूची में रखा गया है। इन सभी समेत कुल आठ लोग पहले ही गिरफ्तार किए जा चुके हैं। जांच में सामने आया कि शुरुआत में ही कर्मचारियों से लगभग 78.94 लाख रुपये जब्त किए गए थे। इसके अलावा 4 जून को गिनती कक्ष से करीब 2.25 लाख रुपये और बरामद हुए थे।
एसआईटी की फाइनेंशियल जांच में पता चला कि संदिग्ध कर्मचारियों के बैंक खातों में उनकी घोषित आय से कई गुना ज्यादा नकदी जमा थी, जबकि उनकी मासिक इनहैंड सैलरी सिर्फ 15 हजार रुपये थी। इतना ही नहीं, ट्रस्ट और एसबीआई की संयुक्त एसओपी को भी पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया था—ना बिना जेब वाली यूनिफॉर्म लागू हुई, ना बायोमीट्रिक अटेंडेंस ठीक से काम करती थी। गिनती से पहले दानपेटियों की रकम भी आपस में मिला दी जाती थी, जिससे गड़बड़ी पकड़ना लगभग नामुमकिन हो जाता था। ढीली सीसीटीवी मॉनिटरिंग ने इस पूरे खेल को और आसान बना दिया। एसआईटी ने साफ कहा कि इन सब खामियों ने मिलकर चोरी के लिए उपयुक्त माहौल तैयार कर दिया था।