भारत से ब्रह्मोस, पाकिस्तान से JF-17! इंडोनेशिया का डबल गेम या बड़ी रणनीति? अंदर की बात जानिए

पाकिस्तान के JF-17 थंडर फाइटर जेट्स की मुस्लिम देशों में तेजी से डिमांड बढ़ रही है. लीबिया के साथ 4 अरब डॉलर, सूडान के साथ 1.5 अरब डॉलर के सौदे हुए. सऊदी अरब से 4 अरब डॉलर की बातचीत चल रही है. बांग्लादेश, इंडोनेशिया, अजरबैजान भी रुचि दिखा रहे हैं. इंडोनेशिया ब्रह्मोस मिसाइल सौदा फाइनल करने के साथ JF-17 पर विचार कर रहा है, जिससे भारत चिंतित है.

Jan 17, 2026 - 13:12
भारत से ब्रह्मोस, पाकिस्तान से JF-17! इंडोनेशिया का डबल गेम या बड़ी रणनीति? अंदर की बात जानिए

पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान के JF-17 थंडर फाइटर जेट्स ने मुस्लिम देशों के बीच मानो तहलका मचा दिया है। पाकिस्तान-चीन की संयुक्त इंजीनियरिंग से बना यह जेट अचानक दुनिया के कई इस्लामिक देशों की पहली पसंद बनता जा रहा है। लीबिया के साथ 4 अरब डॉलर का मेगा डील, सूडान से 1.5 अरब डॉलर का करार और सऊदी अरब के साथ करीब 4 अरब डॉलर की बातचीत—सब मिलकर इस जेट को सुर्खियों में ला रहे हैं।

इसके अलावा बांग्लादेश, अजरबैजान और इंडोनेशिया जैसे देश भी इसकी खरीद को लेकर गंभीरता से सोच रहे हैं। बड़ा सवाल यह है कि आखिर JF-17 की मांग इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही है? विशेषज्ञों का कहना है कि यह ट्रेंड अमेरिका के घटते वैश्विक असर का सीधा संकेत है।

JF-17 की बिक्री तेज क्यों हो रही है?

JF-17 थंडर एक मल्टी-रोल, आधुनिक और किफायती फाइटर जेट है, जिसे पाकिस्तान की PAC और चीन की चेंगदू एयरोस्पेस ने मिलकर तैयार किया है। सस्ता रखरखाव, आधुनिक हथियार और आसान ऑपरेशन इसे छोटे और मध्यम बजट वाले देशों के लिए बेहद आकर्षक बनाते हैं। पाकिस्तान अब इसे मुस्लिम देशों में बड़े पैमाने पर बेचकर अपनी अर्थव्यवस्था को बूस्ट देने की कोशिश कर रहा है।

ये डील्स न सिर्फ पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति को मजबूत करती हैं, बल्कि चीन की वैश्विक हथियार रणनीति को भी बढ़ावा देती हैं। दोनों देशों के लिए JF-17 एक महत्वपूर्ण स्ट्रेटजिक कार्ड बन चुका है।

अमेरिकी प्रभाव में गिरावट क्यों?

विश्लेषकों के मुताबिक, यह पूरी तस्वीर अमेरिका की सिकुड़ती पकड़ को दर्शाती है। सालों तक सऊदी अरब और खाड़ी देश अमेरिकी हथियार और सुरक्षा सिस्टम पर निर्भर रहे, लेकिन अब वे नई राहें तलाश रहे हैं। चीन के जेट्स और पाकिस्तान की रक्षा सप्लाई लाइनों से उन्हें विकल्प मिल गया है, जिससे अमेरिका की पकड़ कमजोर पड़ रही है।

अगर अमेरिका दबाव बनाएगा तो ये देश और ज्यादा चीन-पाकिस्तान ब्लॉक की ओर झुक सकते हैं। इसीलिए वॉशिंगटन इस समय बेहद सावधानी से कदम रख रहा है। ट्रंप दौर में ईरान पर हमला न करने का फैसला भी इसी बदलते प्रभाव का बड़ा संकेत था।

इंडोनेशिया: JF-17 में दिलचस्पी, लेकिन ब्रह्मोस भी नजर में

भारत के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द इंडोनेशिया का दोहरी नीति वाला रुख है। एक ओर वह भारत के साथ 450 मिलियन डॉलर के ब्रह्मोस मिसाइल सौदे को लगभग अंतिम रूप देने वाला है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान के JF-17 की खरीद पर भी गंभीरता से विचार कर रहा है।

हाल ही में इंडोनेशिया के रक्षा मंत्री और पाकिस्तान के एयर चीफ की इस्लामाबाद में मुलाकात हुई, जहां पाकिस्तान ने 40 JF-17 की पेशकश की। इतना ही नहीं, इंडोनेशिया पाकिस्तानी कॉम्बैट ड्रोन खरीदने की सोच भी रहा है।

भारत इंडोनेशिया को दक्षिण चीन सागर में चीन के खिलाफ बेहद अहम रणनीतिक साझेदार मानता है। ऐसे में चीन-पाकिस्तानी हथियार खरीदना भारत और इंडोनेशिया के बीच भरोसे को कमजोर कर सकता है और पूरे क्षेत्र की सुरक्षा को उलझा सकता है। साथ ही बांग्लादेश द्वारा JF-17 में रुचि दिखाना भी पाकिस्तान की बढ़ती क्षेत्रीय पैठ का संकेत है।

ब्रह्मोस मिसाइल क्यों इतना बड़ा गेम-चेंजर है?

ब्रह्मोस भारतीय और रूसी तकनीक से बनी दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में से एक है। 300 किमी की जबरदस्त रेंज और मैक-3 से अधिक की रफ्तार इसे दुश्मन के लिए लगभग अजेय बना देती है। फायर-एंड-फॉरगेट सिस्टम इसे लॉन्च के बाद खुद लक्ष्य ढूंढने में सक्षम बनाता है।

मई 2023 में भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान ब्रह्मोस ने पाकिस्तान के 12 में से 11 प्रमुख एयरबेस को भारी नुकसान पहुँचाया था। इस हमले ने पाकिस्तान की रक्षा पंक्ति को हिला दिया था और खुद शहबाज शरीफ ने स्वीकार किया था कि हमला अप्रत्याशित था।

इंडोनेशिया ब्रह्मोस को नतूना सागर में अपनी रक्षा को मजबूत करने के लिए खरीदना चाहता है। फिलीपींस भी इसे खरीदकर अपनी समुद्री सुरक्षा को कई गुना बढ़ा चुका है।

भारत की चिंता क्या है और आगे क्या हो सकता है?

भारत के रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि इंडोनेशिया का JF-17 को लेकर अचानक सक्रिय होना ब्रह्मोस डील के बीच एक गलत संकेत दे रहा है। इससे दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी पर असर पड़ सकता है। नवंबर 2023 में दोनों देशों की रक्षा वार्ता में ब्रह्मोस पर बड़ा प्रगति हुई थी और अब सिर्फ रूस की मंजूरी बाकी है।

इंडोनेशियाई राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो की 2025 गणतंत्र दिवस यात्रा के दौरान भी इस सौदे पर गंभीर चर्चा हुई थी। ब्रह्मोस इंडोनेशिया की सैन्य आधुनिकता के लिए बड़ा कदम साबित होगा, लेकिन JF-17 की खरीद इस समीकरण को उलझा सकती है।