ट्रंप के ईरान अटैक प्लान से कांपा पाकिस्तान! क्या अब अपने ही वजूद पर आ गया है खतरा?
ईरान पर अमेरिका के संभावित हमले के बीच पाकिस्तान में चिंता बढ़ गई है, खासकर बलूचिस्तान प्रांत में विद्रोह की आशंका को लेकर. पाकिस्तान को डर है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन से सीमा पार उग्रवाद, हथियार तस्करी और शरणार्थी संकट बढ़ सकता है.
अमेरिका की ओर से ईरान पर संभावित हमले की भनक ने पाकिस्तान में खलबली मचा दी है। इस खतरे के साये में इस्लामाबाद को डर सताने लगा है कि अगर तेहरान में सत्ता उलटती है, तो उसके बाद भड़कने वाली आग सीधी पाकिस्तान तक पहुंच सकती है। खासकर इसलिए क्योंकि पाकिस्तान का अशांत बलूचिस्तान, ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान से बिल्कुल सटा हुआ है, जहां लंबे समय से अलगाव की लहर उठती रही है।
पाकिस्तान के सत्ता गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि ईरान में अशांति बढ़ते ही बलूचिस्तान में सक्रिय समूह और उग्र हो सकते हैं। डिप्लोमैट्स तक यह चेतावनी दे रहे हैं कि अगर ईरान की शासन व्यवस्था ढही, तो उसके झटके पाकिस्तान को बुरी तरह हिला देंगे।
प्रमुख अखबार ‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ में प्रकाशित एक गहन विश्लेषण में पाक विशेषज्ञों और अधिकारियों ने साफ कहा है कि इस्लामाबाद किसी भी कीमत पर ईरान में सत्ता बदलाव नहीं चाहता। लेख के मुताबिक, अगर तेहरान अस्थिर होता है, तो पाकिस्तान को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
करीब 900 किलोमीटर लंबी साझा सीमा के कारण ईरान की हर हलचल पाकिस्तान के लिए सीधा खतरा बन सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान में गड़बड़ी बढ़ी, तो सीमा पार से हथियारों की तस्करी, उग्रवाद, शरणार्थियों की बाढ़ और आर्थिक संकट—सभी एक साथ पाकिस्तान पर टूट सकते हैं।
ईरान में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत आसिफ दुर्रानी ने चेतावनी देते हुए कहा कि चाहे हालात भीतर से बदलें या बाहरी दखलअंदाजी से, इसके असर से पाकिस्तान बच नहीं पाएगा।
इस पूरी स्थिति में पाकिस्तान की सबसे बड़ी चिंता बलूचिस्तान है, क्योंकि ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान में रहने वाले बलूच, पाकिस्तान के बलूचों से जातीय और सांस्कृतिक रूप से गहरे जुड़े हैं। यही रिश्ता संकट को और जटिल बना देता है।
अगर ईरान अस्थिर होता है, तो बलूच विद्रोही नेटवर्क को नया सहारा मिल सकता है। वे सुरक्षित ठिकानों का फायदा उठाकर सीमा पार हमले तेज कर सकते हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में आतंकवाद पर जो नियंत्रण पाने की वर्षों लंबी कोशिश की है, वह एक झटके में ध्वस्त हो सकती है।
बलूचिस्तान के कई उग्र गुट लगातार सुरक्षाबलों और चीनी परियोजनाओं को निशाना बनाते रहे हैं। यहां चल रहा चीन का मेगा प्रोजेक्ट CPEC किसी भी नई उथल-पुथल से बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। विद्रोहियों ने पहले भी कहा है कि बलूचिस्तान पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है, और अगर आंदोलन भड़का तो प्रांत के टूटने का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा।
पूर्व विदेश सचिव जोहर सलीम याद दिलाते हैं कि पहले भी जब ईरान-इजरायल के बीच तनाव बढ़ा था, पाकिस्तान ने खुलकर ईरान की संप्रभुता का समर्थन किया था।
वे आगाह करते हैं कि मौजूदा हालात में किसी भी तरह का बाहरी सैन्य, साइबर या आर्थिक हस्तक्षेप पूरी स्थिति को भयंकर बना देगा और पहले से दबाव झेल रहे ईरान को और अस्थिर कर देगा—जिसका सीधा असर पाकिस्तान पर पड़ेगा।
अफगानिस्तान में 2021 में तालिबान की वापसी के बाद लाखों शरणार्थियों ने पाकिस्तान की कमर तोड़ दी थी। ऐसे में अगर ईरान में सत्ता उलटफेर होता है या अमेरिकी दखल बढ़ता है, तो पाकिस्तान को एक और विशाल शरणार्थी संकट से जूझना पड़ सकता है—जिसके लिए वह बिल्कुल तैयार नहीं है।
IMF के कर्ज पर चल रही पाक अर्थव्यवस्था के लिए अतिरिक्त शरणार्थियों का बोझ किसी भी समय इसे ढहा सकता है।
पाकिस्तानी विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि ईरान में होने वाला कोई भी जोर-जबरदस्ती का राजनीतिक बदलाव पूरी मध्य-पूर्व में दरारें गहरा देगा। इससे प्रॉक्सी वॉर बढ़ेंगे, और चीन, रूस, तुर्की जैसी शक्तियां भी इस संघर्ष में खिंच सकती हैं।
ऊर्जा, व्यापार और प्रवासी कामगारों से मिलने वाली कमाई—तीनों के लिए पाकिस्तान खाड़ी देशों की स्थिरता पर निर्भर है। अगर यह क्षेत्र ही हिल गया, तो पाकिस्तान के लिए आर्थिक अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाएगा।
मीडिया रिपोर्ट्स तक कह रही हैं कि अगर ईरान में सत्ता गिरती है, तो पाकिस्तान के लिए यह एक विनाशकारी रणनीतिक झटका होगा—जिसका असर आने वाले वर्षों तक दिखेगा।