कोमा में 12 साल, जीवन और मौत के बीच… गाजियाबाद के हरीश की कहानी, इच्छामृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय तय
चंडीगढ़ में 2013 में बीटेक छात्र हरीश चौथी मंजिल से गिरकर गंभीर रूप से घायल हुआ. कुछ लोगों ने इस हादसे के पीछे साजिश की आशंका जताई. गिरने की घटना में उसके सिर में गहरी चोट लगी.
देश भर की निगाहें आज उस दिल दहला देने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जिसमें सुप्रीम कोर्ट 12 साल से कोमा में पड़े 31 वर्षीय हरीश को पैसिव इच्छामृत्यु देने की मांग पर निर्णय सुनने जा रहा है. गुरुवार 15 जनवरी की यह सुनवाई हज़ारों परिवारों की उम्मीदों और दर्द से जुड़ा बड़ा मोड़ साबित हो सकती है.
मंगलवार को जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन ने कोर्ट के कमेटी रूम में हरीश राणा के माता-पिता से मुलाकात की. जजों ने नज़दीक से उनकी व्यथा सुनी और मामले की वास्तविक स्थिति को समझने की कोशिश की, ताकि अंतिम फ़ैसले तक पहुंचने से पहले परिवार का पक्ष पूरी ईमानदारी से जाना जा सके.
पिछली सुनवाई में पीठ ने साफ कहा था कि वे किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले परिजनों की भावनाओं और मेडिकल रिपोर्ट्स को गंभीरता से परखना चाहते हैं. विशेषज्ञ डॉक्टरों की दो अलग-अलग मेडिकल बोर्ड रिपोर्ट्स भी कोर्ट के सामने हैं, जिनमें हरीश के ठीक होने की संभावना बेहद कम बताई गई है.
जिंदगी और मौत के बीच अटका हरीश
कोर्ट रिकॉर्ड में दर्ज रिपोर्ट्स के मुताबिक हरीश पिछले साढ़े 12 साल से बिस्तर पर निर्जीव-सी सांसें ले रहा है. उसके वकील मनीष जैन बताते हैं कि विशेष तरल आहार भी उसे केवल ट्यूब के ज़रिए दिया जाता है. वह न बोल सकता है, न खुद को किसी भी तरह व्यक्त कर पाता है.
कभी-कभार आंखें खुल भी जाएं तो उनमें हरकत नाम की कोई चीज़ नहीं दिखती. लगातार बिस्तर पर पड़े रहने से उसकी पीठ पर गहरे घाव बन चुके हैं, जो उसकी दशा की गंभीरता खुद ब खुद बयां करते हैं.
2013 की वह हादसों भरी रात
चंडीगढ़ में बीटेक की पढ़ाई के दौरान 20 अगस्त 2013 को चौथी मंजिल से गिरने या गिराए जाने की रहस्यमयी घटना ने उसकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी. सिर में लगी गंभीर चोट और मस्तिष्क को हुए स्थाई नुकसान ने उसे ऐसी स्थिति में पहुँचा दिया, जहां लौटना अब लगभग असंभव बताया जा रहा है.
दर्द से टूटे उसके माता-पिता ने तीन साल पहले सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी कि जब बेटा गरिमापूर्ण जीवन नहीं जी पा रहा, तो उसे कम से कम गरिमापूर्ण मृत्यु मिलनी चाहिए. यही याचिका अब इंसानियत और कानून, दोनों के लिए अग्निपरीक्षा बन चुकी है.
क्या होती है इच्छामृत्यु?
इच्छामृत्यु का अर्थ है—किसी व्यक्ति के असहनीय दर्द को खत्म करने के लिए, उसकी इच्छा से, डॉक्टर की मदद से जीवन का शांतिपूर्ण अंत करना. इसे दो भागों में बांटा गया है: एक्टिव और पैसिव इच्छामृत्यु.
एक्टिव इच्छामृत्यु में डॉक्टर सीधे दवा या इंजेक्शन देकर मौत को अंजाम देते हैं, जबकि पैसिव इच्छामृत्यु में इलाज रोक दिया जाता है, वेंटिलेटर से हटाया जाता है या दवाएं बंद कर दी जाती हैं. साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता दी थी.
अब गुरुवार का दिन इस ऐतिहासिक और बेहद संवेदनशील मामले में नया मोड़ ला सकता है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट इच्छामृत्यु पर एक बेहद अहम फैसला करने जा रहा है.