ईरान में गूंजा सत्ता परिवर्तन का अलार्म! पूर्व प्रिंस बोले– अब अमेरिकी सेना का दखल जरूरी
ईरान के निर्वासित क्राउन प्रिंस रजा पहलवी ने खामेनेई नेतृत्व के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को इस्लामिक शासन के अंत का स्वर्णिम अवसर बताया है. द वॉल स्ट्रीट जर्नल से बातचीत में उन्होंने कहा कि ईरान में सत्ता परिवर्तन के लिए अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है, क्योंकि मौजूदा इस्लामिक शासन अपने सबसे कमजोर दौर में है.
ईरान के निर्वासित युवराज रजा पहलवी ने अपने एक धमाकेदार बयान में कहा है कि देशभर में भड़क रहे विरोध-प्रदर्शन इस्लामिक शासन के पतन का सबसे बड़ा और शायद आख़िरी मौका साबित हो सकते हैं। 'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' से बातचीत में उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि इस्लामिक शासन को गिराने के लिए किसी विदेशी सेना, अमेरिकी हथियारों या गुप्त अभियानों की जरूरत नहीं है। उनके मुताबिक, यह बदलाव ईरानी जनता खुद लाने की ताकत रखती है, क्योंकि मौजूदा शासन अपनी बेहद कमजोर स्थिति में पहुंच चुका है।
लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष ईरान के मुखर समर्थक रजा पहलवी हाल के प्रदर्शनों में खुलकर लोगों के साथ खड़े नजर आए हैं। वह लगातार वैश्विक समुदाय से अपील कर रहे हैं कि ईरान के नागरिकों का समर्थन करें, क्योंकि यह केवल आर्थिक तंगी का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे इस्लामिक शासन को उखाड़ फेंकने की लड़ाई बन चुकी है। पहलवी का कहना है कि पहले की तुलना में इस बार हालात पूरी तरह बदल चुके हैं और जनता अब पीछे हटने वाली नहीं है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि इस समय परिस्थितियां एक-दूसरे के साथ ऐसी मेल खा रही हैं कि शासन के पतन की संभावनाएं पहले कभी इतनी मजबूत नहीं दिखीं। देश की बिगड़ती आर्थिक हालत, जनता का बढ़ता गुस्सा, दुनिया भर का दबाव और शासन की गिरती साख—इन सभी ने मिलकर अयातुल्ला अली खामेनेई की सत्ता को हिलाकर रख दिया है। पहलवी के अनुसार, यह वही ऐतिहासिक घड़ी है जिसका इंतजार ईरान सालों से कर रहा था।
ईरान का भविष्य तय करेगी जनता: पहलवी
भविष्य में किसी पद या सत्ता की भूमिका को लेकर पूछे गए सवाल पर पहलवी ने साफ कहा कि उन्हें किसी कुर्सी की लालसा नहीं है। उनका लक्ष्य ईरान को इस अराजक दौर से बाहर निकाल कर एक स्थिर और एकजुट देश बनाने में मदद करना है। वह कहते हैं कि अगर सत्ता परिवर्तन होता है, तो सबसे बड़ी जरूरत लोगों के बीच विश्वास बहाल करने और दशकों की दमनकारी नीतियों से बने घाव भरने की होगी। उनके अनुसार, ईरान की किस्मत का फैसला सिर्फ और सिर्फ वहां की जनता ही करेगी।
पहलवी का मानना है कि यह आंदोलन किसी साधारण विरोध प्रदर्शन की तरह नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक मोड़ है जो ईरान को पूरी तरह नए राजनीतिक रास्ते पर ले जा सकता है। 2025 के अंत में शुरू हुआ यह उभार 2026 तक आग की तरह फैल चुका है। आसमान छूती महंगाई, रियाल की ऐतिहासिक गिरावट और बेरोजगारी से परेशान लाखों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। कई शहरों में लोग 'जाविद शाह' के नारे लगाते हुए पहलवी राजवंश की वापसी की उम्मीद जता रहे हैं। सुरक्षा बलों के दमन के बावजूद विरोध की लहर थमने का नाम नहीं ले रही।
कौन हैं रजा पहलवी और कैसा है उनका ईरान से रिश्ता?
रजा पहलवी ईरान के आखिरी शाह मोहम्मद रजा शाह पहलवी के सबसे बड़े बेटे हैं। 31 अक्टूबर 1960 को तेहरान में जन्मे पहलवी 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद परिवार समेत देश छोड़ने पर मजबूर हो गए और तब से अमेरिका में निर्वासन का जीवन जी रहे हैं। वह खुद को ईरान की इस्लामिक व्यवस्था के सबसे मजबूत लोकतांत्रिक विकल्प के रूप में पेश करते हैं और मानवाधिकार, लोकतंत्र और धार्मिक आजादी पर आधारित शासन की वकालत करते हैं।
हालांकि वह कभी-कभार राजशाही की बहाली पर भी बोलते हैं, लेकिन वह हमेशा इस बात पर जोर देते हैं कि ईरान का भविष्य केवल जनमत संग्रह से तय होगा। अमेरिका में रहते हुए वह लगातार ईरान में हो रहे दमन, मानवाधिकार हनन और राजनीतिक अत्याचारों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाते रहे हैं। बीते कुछ वर्षों में, खासकर सरकार-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान, वह विपक्ष की सबसे प्रभावशाली आवाज बनकर उभरे हैं।