UGC कानून पर फंसी BJP! देशभर के विरोध के बाद बदले मोदी सरकार के सुर, बैकफुट पर आई सरकार?

UGC के नए कानून के खिलाफ सामान्य वर्ग का विरोध बढ़ता जा रहा है। कई जगह लोग सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं और इस्तीफे भी शुरू हो गए हैं। बढ़ते जनआक्रोश के बीच मोदी सरकार का यह फैसला BJP के लिए गंभीर राजनीतिक चुनौती बनता दिख रहा है।

Jan 28, 2026 - 11:17
UGC कानून पर फंसी BJP! देशभर के विरोध के बाद बदले मोदी सरकार के सुर, बैकफुट पर आई सरकार?

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने साफ शब्दों में कहा कि नए नियमों के तहत अब किसी भी तरह का भेदभाव या उसके नाम पर नियमों का दुरुपयोग बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने भरोसा दिलाया कि हर फैसला संविधान की सीमाओं के भीतर ही लिया जाएगा और किसी भी वर्ग के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा।

UGC New Rule: आखिर यूजीसी के नए रेगुलेशन को लेकर इतना हंगामा क्यों मचा है? शिक्षाविदों की मानें तो इसके पीछे कई बड़े बदलाव हैं, जो पूरे शैक्षणिक माहौल को सीधे प्रभावित करते हैं।

पहले भी कैंपस में जातिगत भेदभाव रोकने के प्रावधान थे, लेकिन 2026 के संशोधित नियमों ने इसकी परिभाषा को पहले से कहीं अधिक व्यापक बना दिया है। अब ‘जाति आधारित भेदभाव’ की श्रेणी में SC-ST के साथ OBC वर्ग के छात्र और कर्मचारी भी स्पष्ट रूप से शामिल कर दिए गए हैं। इन वर्गों की शिकायतों पर संस्थानों को अनिवार्य कार्रवाई करनी होगी, जबकि सामान्य वर्ग के विद्यार्थी सवाल उठा रहे हैं कि क्या इससे समानता का सिद्धांत कमजोर पड़ जाएगा।

पुराने 2012 के नियमों में झूठी शिकायतों पर किसी प्रकार का दंड या जुर्माना तय नहीं था। 2025 के ड्राफ्ट में पेनल्टी का प्रस्ताव जरूर जोड़ा गया, लेकिन 2026 की अंतिम अधिसूचना से उसे हटा दिया गया। इसका तर्क दिया गया कि इससे वास्तविक पीड़ित बिना डर अपनी बात कह सकेंगे और उनकी पहचान भी सुरक्षित रहेगी। वहीं विरोधी पक्ष को आशंका है कि इससे फर्जी आरोपों की संख्या बढ़ सकती है और सामान्य वर्ग के छात्रों में असुरक्षा की भावना पैदा हो सकती है।

नए नियमों में ‘समता समिति’ के गठन को अनिवार्य किया गया है, जिसमें OBC, दिव्यांगजन और SC-ST वर्ग की महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिलेगा। छात्र समुदाय सवाल कर रहा है कि इस समिति में सवर्ण वर्ग का प्रतिनिधि क्यों नहीं रखा गया। साथ ही झूठी शिकायतों पर किसी कार्रवाई का अभाव भी बड़ा सवाल बना हुआ है। आलोचक पूछ रहे हैं—जब संविधान सभी नागरिकों को समान दर्जा देता है, तो कैंपस में वैसी समानता दिखाई क्यों नहीं देती?